Verse 1 – भेंट – Gift

ले यह भेंट और दे चरणामृत दाता मेरे ठाकुर,
मैं चढ़ावा लेकर आया अपनी कविता ‘घर’ |
ना मैं लाया भेंट रूपया ना ही मांगू दौलत,
मेरी भेंट यह लेकर बाँट आना घर-घर ||

Verse 2 – जीवन – Life

एक टुकड़ा मैं रोटी मांगू सोने से बस नुक्कड़ ,
इक पल मांगू मुस्काने को , इस धरती के ऊपर |
रोने का एक पहर मैं मांगू , लोटा एक शराब,
ओक से रह-रह पीड़ा चलके , यही है जीवन घर ||

Verse 3 – जी ले – Live

करले खर्च कमाई साड़ी जीवन है नश्वर ,
मिटटी की काया मिलनी है मिटटी के अंदर |
नहीं रहेंगे गीत गवैये ना दौलत ना आस ,
तुझको भी माटी होना है माटी होगा घर ||

Verse 4 – रूह – Soul

खाली रूह है तेरी टेड़े जीने के औज़ार ,
सुन्दर-सा लिबास पहन ले रंग ले तू वस्त्र |
आँखों को चुंधियाने वाली लौ ज़रा-सी ले ले ,
दे अपने अंधियारे तन को जिल जिल करता घर ||

Verse 5 – जीवन चक्र – Life Cycle

जो आया है उसको जाना है , पूर्ण कर चक्कर,
इक पल हँसना खीझ घडी- भर थोड़ा माल-ओ -जर |
उसके बाद न सूरज होगा, ना होंगे तारे,
कलमुंहें अंधियारे में काँपेगा थर -थर -घर ||

Verse 6 – पत्र -Letter

न आते न बुलाते न चिट्ठी- पत्तर ,
हाल- हवाल न पूछें न ही लेते कोई खबर |
मैं लजालू क्या बतलाऊँ, कितनी उनकी चाह,
स्वाद खून का लगा शेरनी भूखी रखी घर ||

Verse 8 – प्रेमपत्र – Love Letter

प्रीत मचा देती है कैसी आंधी और झक्कड़,
मैं न समझूँ प्यार- व्यार को मै नादां अनगढ़ |
मुझे बता दो लिख कर, क़ैसे लिखते हैं चिट्ठी,
ख़ुद डाकिया बन कर दूँगा चिट्ठी तेरे घर ||

Verse 9 – डोर – Thread

कच्चा धागा प्रीत, कह गए रामधन कविवर,
यही सूत जब कसने लगता देता लाख फ़िक्र |
पया रामधन जी मुझ को दे दो ऐसी सीख,
अगर बंधी न डोर प्रीत की कैसे बनेगा घर ||

Verse 10 – कुंज – Bowerbird

मत कर निंदा कुंज की यह तो लम्बा करे सफर,
विश्राम-स्थल की खोज में चाहे थक जाते हैं पर |
ख़ास जगह ही बुने घोंसले , ममता का बंधन ,
लम्बे सफर पे फिर उड़ जाना छोड़ के अपना घर ||

Verse 11 – समानांतर – Parallel

जैसे झरने ढूंढे नदियां ,नदियां दूँढे सर,
जैसे हवा आसमानों में खोजे निज दिलबर |
कोई यहाँ नहीं एकाकी सभी हैं जोड़ीदार,
प्रीत में फिर क्यों मिल न पाते तेरे मेरे घर ||

Verse 12 – प्रीत – Love

कुड़ी एक गावँ बगूने की रूपवती चंचल,
उसके रूप-अनूप पे जाकर अटकी मेरी नज़र |
देख के उसके दिल खिल उठता रखूँ उसको पास,
जब तक जीवन तब तक होगी प्रीत हमारा घर ||

Verse 13 – उदासीन – Indifferent

मै पागल था दुनिया ने भी समझा , की न खातिर,
मैंने भी सम्मान दिया न , किया न उसका आदर |
देता क्या आदर उसको जो समझे मुझे अकिंचन,
उसकी खातिर क्यों उजाडूँ मै अपना ही घर ||

Verse 14 – झूला – Seesaw

एक ओर महापुरुष विराजे दुनिया के अंदर,
ओर दूसरी तरफ जुगाली करते बैठे जिनावर |
यह मानुष रस्सी का सेतु इस खाई के ऊपर ,
पल भर न निश्चित हो पाए कहाँ है उसका घर ||

Verse 15 – शिकारी – Hunter

अरे शिकारी मार न पंछी इतना जुल्म न कर,
फल भीषण है इस गुनाह का लागे तूने न डर |
यह निर्बल,बलवान बलि वह देखे सारे पाप,
हँसता- बसता क्यों उजाड़े तू किसी का घर ||

Verse 17 – उम्र – Age

किसी ने पूछा कितना अनुभव कितनी तेरी उम्र ,
अभी किया न लेखा-जोखा हुई बहुत गड़बड़ |
मानव उमरे ही गिनता है उस पल जब के फिर ,
कुछ न गिनने को बचता है बैठ अकेले घर ||

Verse 18 – बचपन – Childhood

छड़ी बलूत की हाथ में मास्टर जी आते लेकर,
हमने सबक न याद किया है हम तो है निडर |
घर पहुंचो तो याद न रहते मास्टर और स्कूल,
नयी ही दुनिया हो जाती है अपना कच्चा घर ||

Verse 19 – मुद्दई – Prosecutor

इतराता है क्यों कर जातक मार नीरीह कबूतर,
थप्पड एक पड़ा तो पल में होश उड़ेंगे फुर्र |
और कहीं आज़माओ ताकत मत मारो मासूम,
बाहर कहीं जो मिला भेड़िया, जाओगे रोते घर ||

Verse 21– मुक्त – Freedom

एक पण्डितायन बाली विधवा उसका भी था घर,
उसके तन की तपन-जलन अब दूर न होती पर |
घर वह उस अभोल का दमघोटूं एक जेल,
तभी कहूं मई तोड़ ज़ंजीराज नया बसा ले घर ||

Verse 50 – सन्नासर- Sannasar

एक दफा मैं निपट अकेला गया था सन्नासर ,
चुम्बक जैसे कोई खींच लोहे को ऊपर |
सर इसका सूखा है लेकिन सुन्दर सहज नज़ारा,
अगर कहीं तौफीक हुई तो यहाँ बनाऊंगा घर ||

Verse 48 – निर्भय दिल – Fearless Heart

हो अगर ना दिल मानव का निर्भय और निडर ,
तो मानवता खतरे में है मुझको लगता डर |
किस खातिर यह घर-चौबारे, लुटे जो अपनी लाज,
तोड़ो ऐसे महल-मीनारे , फूंको ऐसे घर ||

Verse 46 – घर – Home

तीर्थ स्थान मिले बेगाने, हर एक तीर्थ पर,
गर्व करें अपनी भक्ति पर बड़े-बड़े मंदिर |
भक्त हैं एक-दूजे को देते पते-आशीषें-भेंटें,
पर सब जाते सुख पाने को अपने-अपने घर ||

Verse 47 – योद्धा – Soldier

गंवई-देहाती जंग को जाते योद्धे यह निडर ,
देशभक्त, पर देश कौन-सा, कुछ ना होश-खबर |
जंग लगी है किस कारणवश इतना भी ना जाने,
पर यह जाने उन्हें बचाने लड़ कर अपने घर ||

Verse 45 – मकड़ जाल – Toils

इच्छाओं का त्याग करूँगा, प्रण किया अक्सर,
इसी तरह यह प्रन भी मेरा है तो इच्छा, पर |
अर्थ यह गहरे शब्दों के, मकड़जाल हैं बनते,
घर को जब त्यागो तब बनती यही लालसा घर ||

Verse 44 – स्वर्ग – Heaven

मानव के कर्मो का लेख होता है आखिर,
स्वर्ग के मुंशी तब कहते है प्राणी देर न कर|
जितनी देर करो वो उतनी ‘सुरगी घटाते ,
सो बेहतर है रोज़ बैठकर लेखा करले घर ||

Verse 43 – पंक्ति – Line

दर-दर भटकूँ पूर्व, पश्छिम,दक्षिण, और उत्तर,
मुझसे कहीं छुपा रखे थे दाता ने अक्षर |
गली-गली मैंन भटका, कोमल पंक्ति मिली ना एक,
मिली अंततः मुझे अचानक खड़ी वो मेरे घर ||

Verse 42 – किस्मत – Luck

मेरा भाग्य सराह रहा वो हाथ की रेखा पढ़ कर,
फीस भरो तो बतलाता हु किस्मत का चक्कर |
दिल करता है कहता दूँ पंडित अपना भाग्य सम्भालो,
फिर सोचूं कुछ चुग्गा लेकर उसे बी जाना घर ||

Verse 41 – राजनीति – Politics

नेता करे एलेक्शनबाज़ी घर घर में जाकर ,
वोट मांगते लोगो से वह कुशल बिखरी बन कर |
पर जब कुर्सी मिल जाए तो भूलें कॉल करार ,
मिलने जायो तो समय न देवे न दफ्तर न घर. ||

Verse 40 – खोजी – Inquistive

प्यासा मन तो बन जाता है फौलादी औज़ार ,
खोजी खोजें खोज खोज कर जान खुरदुरी कर |
इसी तरह फिर सच्चे खोजी ढूंढे जीवन-सार ,
प्यास बुझाते और बनवाते वह फौलादी घर ||

Verse 37 – लीला – Sight

अगर देखनी चाहो लीला प्रेम की , बनो निडर,
डरते-डरते कदम न रखना प्रेम के इस मंदिर |
लाज प्रेम की रखनी है तू इसे लहू से सींच ,
प्यार खून से रंगे न जब तक बनता नहीं है डर ||

Verse 35 – दफ्तर – Office

झूठ , फरेब ,होड़, षड़यंत्र होते हर दफ्तर,
खींचातानी, ताक-झांक, हेरा-फेरी और डर |
यह कूड़ा गर घर ना लाओ, रखो इससे पाक,
छोटे-बड़े कुशल खुश होकर रहते ऐसे घर |

Verse 34 – गुलदस्ते – Bouquets

घर की शोभा बने गृहस्ती और उसके अंदर
आशाओं के बीजों से ही फूटे प्रेमांकुर |
यह है क्यारी तू माली है सींच गुढ़ाई कर,
मधुर सुवासित गुलदस्तों से सजेगा तेरा घर ||

Verse 36 – सतत – Perseverance

शौक अनोखा पाला है गर मन मंदिर के अंदर,
साध बना लो उसको अपनी सब साधों से ऊपर |
भूख और लोभ को दिल से त्यागो, उसकी राह ना छोड़ो,
मिट जाये हस्ती तेरी या उजड़े तेरा घर ||

Verse 32 – हाथ थाम ले – Hold My Hand

प्रीत अगर है मुझसे सच्ची दुनिया से न डर ,
आओ रसमें तोड़ दें सारी , ले ये हाथ पकड़ |
तू पौंछ ले आँसू अपने यजोपवीत मैं तोडूं,
चिंता न कर हाथ थाम ले चल तू मेरे घर ||

Verse 31 – चोर बजारी – Deception

बहुत मिला धन कुछ लोगो को मिला ना चैन मगर ,
चोर – बाजारी के कारण ही मन में समाया डर
मखमल के गद्दों पर भी न आती नींद उन्हें ,
चोर यदी मन में आ बैठे नरक बने है घर ||

Verse 30 – डोली – Palanquin

बाबुल कहता है बैठ लाड़ली डोली के अंदर ,
यह वर तेरा , ईश्वर तेरा , वो घर अब मंदिर |
बिटिया पूछे कब लौटूंगी बापू अपने घर ,
बाबुल बोले आज से बेटी वो ही तेरा घर ||

Verse 29 – परिवार – Family

घर का लोभ तो होता है हर लालच से ऊपर,
घर की खातिर दुनिया लेती दुनिया से टक्कर |
खून-कत्ल होते भाइयों में इसके ही ख़ातिर ,
हर कोई इसकी रक्षा करता , ऐसी चीज़ है घर ||

Verse 28 – जोड़ – Connection

जो बेघर हैं उनके हित में इस दुनिया अंदर ,
अपना नहीं ठिकाना कोई ना ही अपना दर |
करें चाकरी घर-घर जा कर जमा करें दौलत ,
आशा है तो केवल इतनी हो अपना भी घर ||

Verse 27 – अल्लाह का घर – God’s House

मंदिर मस्जिद और गिरजों में उमड़े जन के लष्कर,
पाप कमाई बख्षाने को आते हैं अक्सर।
वहम उन्हें है धोखे से ‘वो’ बन जाएगा मूर्ख,
सब का लेखा यहाँ पे रहता यह अल्लाह का घर।।

Verse 26 – शराब – Alcohol

मज़दूर के पैसे लेके जाता ठेके पर,
घर आकर फिर गर्जन करता यह कंजरी का घर |
प्रेत नशा, न दिखते उसको बच्चे भूखे-प्यासे,
घर घोंसला होता है जो समझे उसको घर ||

Verse 25 – मां – Mother

एक ज़िद्दी और चंचल बालक चढ़ा जो पीपल पर ,
अम्मा जा तू, न लौटूंगा साँझ ढले तक घर |
ठोकर लगी जो अनजाने में हुआ वह लहूलुहान ,
ज़ोर ज़ोर से रोते बोला ले चल अम्मा घर