Verse 131 – श्री नगर – Sri Nagar

शालीमार और चश्माशाही झरनों की झर-झर ,
पहली बार जो होंठ थे चूमे तेरे श्रीनगर |
डल के भीतर एक शिकारी , बैठे मैं और तू ,
क्या कर बैठे,हमने चाहे कैसे-कैसे घर ||