Verse 174-कविता -Poem

कहे यदि वह मुझे कि- तेरी कविता है सुन्दर,
पूजूंगा उसको रख अपना माथा पैरों पर।
नहीं थकूंगा लेते उसके गोरे गालों का चुम्बन,
कर-कमलों से पकड़ के उसको ले आऊँगा घर ||

Verse 114-महबूब- Lover

तू मस्तानी, है मन-भानी रूप का तू सागर,
ओक लगा के मांग रहा हूँ उंढेल दे तू गागर |
मुझे रूप की तृषा, प्रेम-जल का हूँ मैं तो प्यासा,
छलक रहा है रूप-तरंगित तेरा प्रेमिल घर ||

Verse 128 – बाहरी सुंदरता – Physical love

वह कहती महके है तन मेरा होंठ मेरे शक्कर,
उस पर मुझे यकीन तभी करूँ उसका मई ज़िक्र।
पूछ न मुझसे कैसे उसको इसका मिला सुराग,
क्या बतलाऊँ इक दिन चोरी मिला मुझे था घर ||

Verse 127 – स्नेह – Affection

सारी खुशियाँ,सोच, वासना प्रीत के हैं चाकर,
इसके मेह्तर-वैद, संतरी सब इसके नौकर |
कोई अगर लालसा जिगर जलाये वह भी इसकी दास,
प्रीत है मलिका, चले हुकूमत इसकी है घर-घर ||

Verse 122 – फूल – Flower

जीवन क्या है ? घास का तिनका, मैं सोचूँ अक्सर,
अथवा फूल क्यारी का है रंग बहुत सुन्दर |
एक हवा के झोंके से ही बिखरे फूल और पात,
जिस घर उगते फूल वो बनता अजब अनोखा घर ||