Verse 57- दिल- heart

‘प्यार कृपण न, क्यों लगाए तू िक्कड़-दुक्कड़,
अपरिमित है दौलत इसकी , क्या करना गिन कर |
दिल इसका है औरो जैसा , जान लुटा देता है ,
बाँहों मेँ अम्बर भरता है तभी तो इसका घर ||