Verse 55- मन – Mind

यह मन पाखी उड़ता जाए , भले थके हो पर,
उड़ते-उड़ते तन का चाहे बन जाये पिंजर |
न ही उसका ठौर ठिकाना , न इसकी मंज़िल,
लम्बी दिव्य उड़ाने पे निकला , पर न कोई घर ||