Verse 22 – Sangharsh – Hustle

दिन चढ़ते ही पंख पखेरू , मेहनतकश चाकर,
जीने का संघर्ष है करते फिर कितने यह दिन-भर |
सांझढ़ले जब हो जाते है थक कर चकनाचूर ,
थकन मिटाने दिन भर की वो वापस आते घर||

Verse 84-छाँव – Shade

असमंजस है ऐसा कुछ न सूझे इधर-उधर,
पूछ रहा पत्ते-पत्ते से बस्ती बसी किधर |
है किस ओर ठिकाना मेरा, मुझे चाहिए छाँव,
तपती जलती धूप में जल कर ढूंढूं अपना घर ||

Verse 46 – घर – Home

तीर्थ स्थान मिले बेगाने, हर एक तीर्थ पर,
गर्व करें अपनी भक्ति पर बड़े-बड़े मंदिर |
भक्त हैं एक-दूजे को देते पते-आशीषें-भेंटें,
पर सब जाते सुख पाने को अपने-अपने घर ||