Verse 81- बच्चे – Children

बच्चों के हम जनक हैं, वे ना हमारे मगर,
समतल उनकी सोच के गर तुम रहने दो क्षेत्र |
कोई बनेगा इनमें गौतम होगा कोई मसीह,
सोच हमारी भिन्न है चाहे साँझा अपना घर ||

Verse 51- निरंक घर- Empty

घर हौंसला होता है बच्चे मांगे बहियन पर,
पंख मिले तो भरे उड़ाने बच्चे गिर फर-फर|
बैठे अकेले अम्मा रोती , रहता बाप उदास,
नीड बनाते बच्चे अपना, कर के सूना घर