Verse 175-डोगरी -Dogri

डोगरी की बदहाली पर है मुझ को बहुत फिकर,
न कोई पढ़ता-सुनता न ही करता कोई ज़िकर।
शायर इसके इक-दूजे से झिझके-ठिठके रहते,
बिना दौड़ के बेदम होकर बैठे रहते घर ||

Verse 140-विभेदन- Discrimination

चाहे मारे पीटें मुझको  मैं यह कहूँ मगर,
हर मज़हब, हर कौम ने, ज़ारी रखी है गड़बड़ |
करें विभाजन जातपात के छोटे-छोटे वृत्त,
दीवारें और बाड़ लगा कर बाटें सांझे घर ||