Verse 88-बिकाऊ-Dishonest

यहाँ बिकाऊ हर वस्तु है गिरजे और मंदिर,
बेचने आया मैं भी अपना रोटी खातिर घर |
पर यह मेरी पत न माने करती मिन्नतें-शिकवे,
रोटी और कपड़े की खातिर भाई बेच न घर ||

Verse 31 – चोर बजारी – Deception

बहुत मिला धन कुछ लोगो को मिला ना चैन मगर ,
चोर – बाजारी के कारण ही मन में समाया डर
मखमल के गद्दों पर भी न आती नींद उन्हें ,
चोर यदी मन में आ बैठे नरक बने है घर ||

Verse 35 – दफ्तर – Office

झूठ , फरेब ,होड़, षड़यंत्र होते हर दफ्तर,
खींचातानी, ताक-झांक, हेरा-फेरी और डर |
यह कूड़ा गर घर ना लाओ, रखो इससे पाक,
छोटे-बड़े कुशल खुश होकर रहते ऐसे घर |