Verse 232-अन्त: मन- Soul

रूप नहीं मरता है हरगिज़ रहता है सदा अमर ,
चोला एक त्याग के पहने दूजे यह ‘बस्तर’ |
माँ मृत्यु के बाद भी बेटी-रूप में जीवित रहती,
रूप बदलता रहता ऐसे रहने हेतु घर ||

Verse 187-चिंता-Tensions

चिंता की रेखा छाए मानव के माथे पर,
हर पल उसके मन में रहता भयभीति का डर |
मौत से पहले उसे निगलता पशु बनैला बन,
रसता -बसता हँसता-गाता जंगल बनता घर||

Verse 150-मृत्यु- Death

मैंने तुम्हे सौंप रखी है प्रेम की जो गागर,
मेरी शवयात्र में लाना बिलकुल खाली कर |
न रोना न शोक मनाना मेरी तुम्हें कसम ,
मेरी अस्थियां डाल के इसमें रखना अपने घर ||

Verse 152-जीवन काल -Life cycle

सोचें जो-क्या होगा जग का यदि गए वे मर ,
उनके बिना चलेगा कैसे सृष्टि का चक्कर |
उनकी देह को कीड़े खाते, समय बड़ा बलवान,
सृष्टि चलती रहती बनती कब्रें उनका घर ||

Verse 76-मौत – Quietus

मानुष सोचे अमर स्कीमें कुशल हैं कारीगर,
चीलों जैसी मौत घूमती गगन में, भूले पर |
ताक लगी रहती है जिसको-दीखे जो कमज़ोरी,
मार झपट्टा ले जाती है खाली करती घर ||

Verse 59-दिलेर – Brave

क्यों बुनते हो , सोचो लोगो, संकोची बुन्तर ,
कौन सा डर है तुम्हे सताता हुई है क्या गड़बड़ |
मौत का इक दिन निश्चित है फिर क्यों मरते रोज़ ,
खौंफ निकालो मन से तो ही , निर्भय होगा घर ||

Verse 44 – स्वर्ग – Heaven

मानव के कर्मो का लेख होता है आखिर,
स्वर्ग के मुंशी तब कहते है प्राणी देर न कर|
जितनी देर करो वो उतनी ‘सुरगी घटाते ,
सो बेहतर है रोज़ बैठकर लेखा करले घर ||