Verse 39 – रंगमंच – Rangmanch

रंगमंच जो घर मेँ हो तो फिर उसके अंदर,
भेदभाव की दीमक लगती है और व्यापे डर |
ऊपर-ऊपर प्रेम दिखावा भीतर विश्वास ,
इसी तरह जर्जर हो जाते है खड़े खड़े ही घर ||

Verse 82- विचार- thoughts

जितने मन हैं उतनी सोचें उतने ही अंतर,
अपने-अपने नाप से सब के बनते हैं वस्र |
भेद सोच का है यह सारा, अपनी-अपनी खोज,
जिसको जैसा भाया, वैसा लिया बनाए घर ||