Verse 188- पथ-Path

तर्क और तकरार का मन में भरा रेत-सागर,
इस पर चलने से होता है मर जाना बेहतर।
अगणित पड़ जाते हैं ऐसे रूह के ऊपर ,
डगर छोड़ कर रुकना पड़ता किसी-किसी के घर ||