Verse 238-हिंदुस्तानी- Indian

मुझे न भाएँ पौंड और रूबल खीचें न डॉलर ,
नहीं दासता करूँ किसी की मानूं न आर्डर।
मैं डुग्गर का वासी सह सकता हूँ भूख व प्यास,
देश बेच कर कभी बनाऊंगा न अपना घर ||

Verse 236-डुग्गर- Duggar

जम्मू में है ग’रने-वसाका थूहर और कीकर,
साँप, ‘गनाह’ बिच्छू ज़हरीले और विषैल विषधर।
लेकिन यहाँ की बोली मीठी जाने सब यह बात ,
जिस के कारण गूँज रहा है डुग्गर का घर-घर ||

Verse 226-कुंजों- Bower

‘कुंजों’ की निंदा होती है-देश है यह डुग्गर,
छोटे पंखिन से सीमित है इनका सदा सफर |
अन्य कोई भाषा न करती कुंजों का तिरिस्कार ,
इसी लिए की इन कुंजों के बहुत दूर है घर ||

Verse 182-केहरि सिंह “मधुकर”-Kehri Singh “Madhukar”

बदल भैया बरसोगे जब डुग्गर देश में जाकर,
मिलना उससे जिसका नाम है केहरि सिंह ‘मधुकर’ |
मेरी वाह-वाह देकर उसको ‘डोली’ कविता पर,
उसका उत्तर बिना सुने ही लौट आना तुम घर ||