Verse 124 – ज़िन्दगी का चक्र – Life-Cycle

जीने का क्यों मोह है इतना, करता व्यर्थ फ़िक्र,
मिलोगे दाता जब तुम हमसे करेंगे लाख शुक्कर।
शुक्र मनाऊं अमर नहीं है यहाँ जीव निर्जीव,
थकी-हांफती नदिया जा मिलती है सागर घर ||