Verse 194-कंटीला-Thorny

वह क्या प्रीत-डगर का राही जिसके मन में डर,
उससे प्रीत निभेगी कैसे सख्त न जिगर।
दिल-ओ-जान की राह के कांटे चुनने पड़ते खुद,
चुभन से डरते रहने पर कंटीला बनता घर ||

Verse 187-चिंता-Tensions

चिंता की रेखा छाए मानव के माथे पर,
हर पल उसके मन में रहता भयभीति का डर |
मौत से पहले उसे निगलता पशु बनैला बन,
रसता -बसता हँसता-गाता जंगल बनता घर||

Verse 35 – दफ्तर – Office

झूठ , फरेब ,होड़, षड़यंत्र होते हर दफ्तर,
खींचातानी, ताक-झांक, हेरा-फेरी और डर |
यह कूड़ा गर घर ना लाओ, रखो इससे पाक,
छोटे-बड़े कुशल खुश होकर रहते ऐसे घर |