Verse 202-सर्वज्ञ-Omniscient

दानी चतुर पांखडी करते दान बहुत मगर,
वक़्त पड़े तो मूत्र न पाते ज़ख्मो के ऊपर |
सोचें यदि यह दान से उनके पाप मिटेंगे सारे ,
परमेश्वर से कब भूला है साथी किसी का घर ||

Verse 190-रूह -Soul

जब भी काँपे रूह तुम्हारी जपता जा हर-हर ,
अल्लाह-अल्लाह राम-राम कोई भेदभाव न कर |
सच्चे मन से जो सोचोगे पूरी होगी बात,
जिसमें चित्त लगाओ, वही रूह का घर ||

Verse 172-भक्ति -Devotion

आलोकित-सा कौन है बैठा सीने के अंदर,
छाती की इस गुफा के भीतर छलके भक्ति-सर।
मेरे गीत हैं जिसके कारण धारा एक अजस्र,
मुझे लगे है दिल मेरा है दुर्गा का ही घर ||

Verse 147- पदार्थवादी-Materialistic

ठीकरियाँ गिन इक इक करके तुझे मिले ठीकर ,
मान ले इनको खेल-खिलौने , पत्थर या ठाकुर  |
श्रद्धा जिसको माने आखिर बनता वही खुदा ,
इन्हीं ख्याली परछाईयों से मानुष भरता घर |

Verse 151-जीवन यात्रा-Life journey

हम मुसाफिर, जीवन टैक्सी, चालक परमेश्वर,
रिश्ता आपस में तीनों का सादा और मुख’सर |
कोई पुकारे,  रोके टैक्सी फ़ौरन लेता सुन,
जेब में अगर किराया हो तो झट पहुँचता घर ||

Verse 149- संतोष- Contentment

जो भी देता दाता उसका करता अदा शूकर ,
काम होता या ज़्यादा होता मुझको नहीं ख़बर |
स्वर्गानन्द उठाते कुटिया में भी रह खुश-दिल ,
दुखी जानो को महलों में भी लगते छोटे घर ||

Verse 145-दुविधा-Dilemma

हे ईश्वर तुम तृप्त न करना मेरी एक जिगर,
बैठा रहूँ निठल्ला, ऐसी देना नहीं नज़र ||
करूँ ना समझौता हरगिज़ देख के अत्याचार,
एक से निपटूँ एक से उलझूँ, चिंताग्रस्त है घर ||

Verse 49 – परमेश्वर-god

ईश्वर क्या है और मिलता कैसे है मै पूछूं अक्सर ,
पंडित मुल्ला और ग्रंथि देते न उतर |
अपने स्थान को ऊँचा आंकी, यह बी कहते पर ,
‘यह घर सारे आपके घर है, कोई न जिसका घर ||

Verse 23- मंदिर – Devalya

एक दिन मई दुखियारा पहुंचा शिवजी के मंदिर ,
मगन खड़ा था शिव-अर्चन में साधु एक्कड़ |
मई बोलै विपता का मारा सीख दीजिये कुछ ,
बोलै वह, क्यों आये यहाँ पर तेरा मंदिर घर ||

Verse 89-ब्रह्मा-Brahma

जीवन दिया मुझे ब्रह्मा ने, पर जीवन देकर,
सोच रहा है इसको भाते धरती और अम्बर |
सोच रहा हूँ उससे क्या मैं वाद-विवाद में उलझूं,
ब्रह्मा मस्त है अपने घर में, मैं व्याकुल अपने घर ||

Verse 75- ग़रूर – Ego

मानुष इक दिन करने लगा था अल्लाह से अकड़,
कहे मैं सब से सार को जानूं, मैं ज्ञानी चातुर |
अल्लाह पूछे क्या है तेरा बोलो मुझसे रिश्ता,
तब मानुष सर नीचे कर के आया वापिस घर ||

Verse 63-तुलसी – Tulsi

तुलसी पिछवाड़े है रोपी आँगन बीच है ‘बड़’
मन के भीतर कपट भरा है दागा न उस से कर |
‘वह’ पहचाने सब को , जाने समझ हर इक चाल ,
तुलसी, पीपल, जप-तप से तो आता नहीं वह घर ||

Verse 62-परमेश्वर – The Eternal

परमेश्वर है एक इकाई , न नारी न नर,
हर वास्तु में वास है उसका जानू ज़ोरावर |
रूप न उसका, न गुण-वृति ,सीमा है बे-हद ,
उसकी हद को ढूंड न मूर्ख बैठे-बिठाये घर ||

Verse 124 – ज़िन्दगी का चक्र – Life-Cycle

जीने का क्यों मोह है इतना, करता व्यर्थ फ़िक्र,
मिलोगे दाता जब तुम हमसे करेंगे लाख शुक्कर।
शुक्र मनाऊं अमर नहीं है यहाँ जीव निर्जीव,
थकी-हांफती नदिया जा मिलती है सागर घर ||

Verse 27 – अल्लाह का घर – God’s House

मंदिर मस्जिद और गिरजों में उमड़े जन के लष्कर,
पाप कमाई बख्षाने को आते हैं अक्सर।
वहम उन्हें है धोखे से ‘वो’ बन जाएगा मूर्ख,
सब का लेखा यहाँ पे रहता यह अल्लाह का घर।।

Verse 1 – भेंट – Gift

ले यह भेंट और दे चरणामृत दाता मेरे ठाकुर,
मैं चढ़ावा लेकर आया अपनी कविता ‘घर’ |
ना मैं लाया भेंट रूपया ना ही मांगू दौलत,
मेरी भेंट यह लेकर बाँट आना घर-घर ||