Verse 177-नफ़रत-Hate

प्रेम की किसने थाह है पाई प्रीत गहन-सागर,
नफ़रत की पैमाईश भी न आसां होती पर।
इतना भेद तो इनका समझ में सबके आता है,
नफ़रत घर को तोड़े लेकिन प्रीत बनाती घर ||

Verse 23- मंदिर – Devalya

एक दिन मई दुखियारा पहुंचा शिवजी के मंदिर ,
मगन खड़ा था शिव-अर्चन में साधु एक्कड़ |
मई बोलै विपता का मारा सीख दीजिये कुछ ,
बोलै वह, क्यों आये यहाँ पर तेरा मंदिर घर ||