Verse 166-विप्रलंभ-Separation

सुन विलाप हीर का हरगिज़ ठट्ठा-हँसी न कर,
बारिसशाह का किस्सा सुनकर सिसकी आहें भर |
इक -दूजे को तरसें रहें, दुनिया करे अलग,
शोक भरे दुखांत यह किस्से,शोकाकुल है घर ||