Verse 84-छाँव – Shade

असमंजस है ऐसा कुछ न सूझे इधर-उधर,
पूछ रहा पत्ते-पत्ते से बस्ती बसी किधर |
है किस ओर ठिकाना मेरा, मुझे चाहिए छाँव,
तपती जलती धूप में जल कर ढूंढूं अपना घर ||

Verse 134 – खून – Blood

तेज़ बहुत है तेज़ बहुत है तेज़ बहुत खंजर
खून हुआ हाँ खून हुआ हाँ खून हुआ भयंकर |
चीर दे चाहे चीर दे पर अब रहा ना जाए अकेला ,
मरना है तो मरना मुझको आके तेरे घर ||

Verse 133 – दर्द – Pain

प्रीत लड़ी जो टूटे उसमें गांठ लगा ले, पर,
धागा फिर भी जुड़ है गांठ ना जाए पर |
कड़वे बोल लगाते आए दिल पे गहरे घाव ,
दुःख की बारिश में निश्चित ही टपके ऐसा घर ||