Verse 145-दुविधा-Dilemma

हे ईश्वर तुम तृप्त न करना मेरी एक जिगर,
बैठा रहूँ निठल्ला, ऐसी देना नहीं नज़र ||
करूँ ना समझौता हरगिज़ देख के अत्याचार,
एक से निपटूँ एक से उलझूँ, चिंताग्रस्त है घर ||