Verse 64-डांगर – Danger

जीवन कोहलू-घर मानव का इन्सा है ‘डंगर’,
और काल के खाल-खींचते , ज़ालिम है हंटर |
बहुत झमेले , बहुत बखेड़े , जीवन के दिन चार ,
उखड़ी सांस , न घास मयस्सर , पानी भी न घर ||