Verse 233-यथार्थ- Reality

बीते समय के खेत में दिखता मुझको ये अक्सर,
घर बनाता बालक कोई ढेरी के ऊपर।
मैं बचपन को याद करूँ तो अंतर समझ में आए,
सपने वाला कैसा था और कैसा असली घर ||

Verse 232-अन्त: मन- Soul

रूप नहीं मरता है हरगिज़ रहता है सदा अमर ,
चोला एक त्याग के पहने दूजे यह ‘बस्तर’ |
माँ मृत्यु के बाद भी बेटी-रूप में जीवित रहती,
रूप बदलता रहता ऐसे रहने हेतु घर ||

Verse 231-मानव- Human

मानव क्या है ? बस मानव है – बोल गए पितर ,
समझ सका न कथन यह उनका मैं तो रत्ती-भर।
सोचूं, बहुत चतुर थे उनकी बुनती समझ ना आई ,
उस बुनती के और अधिक उलझा बैठा वह ‘घर’ ||

Verse 227- इंद्रधनुष- Rainbow

इंद्रधनुष के झूले ने है चित्रित किया है अम्बर,
इसका बनना वायु में जल-कण पर है निर्भर |
इसी तरह जीवन में गर न बरसे प्रेम-फुहार ,
फीका-फीका लगने लगता महलों जैसा घर ||

Verse 221-चिंता – Tensions

हम आये थे इस दुनिया में बिन दौलत बिन ज़र ,
उम्र बिताई चिंताओं में रहे काँपते थर-थर।
अंत में सत्य समझ यह आया सोच है यह बेकार ,
पुरखे गए, तो हम भी आखिर छोड़ेंगे यह घर ||

Verse 220-पतझड़-Autumn

कल तक पत्ते हरे भरे थे आज लगी पतझर ,
कब तक हरित की प्रतीक्षा में रहोगे यूँ आतुर।
पतझर आई है तो हरे भी लौटेंगे, रे मन,
जीवन नाम गति का यूँ न बैठ बिसूरो घर ||

Verse 216-लहर -Wave

नैय्या है कमज़ोर और लहरें आई है ऊपर ,
धारा में है तेज़ नुकीली चट्टानें-पत्थर।
घाट पे नर्तन करती पीड़ा, घुंगरुं उसके छनकें ,
आशाओं का मांझी , बोलो कैसे पहुँचे घर ||

Verse 215-कसौटी-Test

उम्र कसौटी है रूह की घिस परखो इस पर ,
खालिस है या हुई मिलावट आ देखें अंतर।
जीवन की कठनाई को गर अपनी मुश्किल माने ,
तब जाकर यह पूरा उतरे खरा कसौटी-घर ||

Verse 207-सूत -Thread

देह सूत है मन चरखा है या मन है सूत्र ,
यही पहेली हल करने में बीती जाए उम्र|
देह-कताई चलती रहती क्या चरखा क्या सूत,
गिन न पाया इस बुनती के सारी उम्र मैं ‘घर’ ||

Verse 205-इच्छुक और इच्छा-Desire

इच्छा, इच्छुक ऐसे जैसे युध और शस्त्र ,
इच्छुक हिट इच्छा होती है बहुत ज़रूरी पर |
जब इच्छुक की गाडी में इच्छा का ईंधन न हो,
गतिहीन चलने का केवल इच्छुक रहता घर ||

Verse 196-आयु -Age

लोग कह रहे मैं जियूँगा सौ-सौ वर्षों भर,
माथे की रेखाओं पर ही करता है निर्भर।
पर मैं करूँ दुआएं चाहे दो पल जीवन पाऊँ ,
किन्तु हों मदमस्त सभी पल, मधुशाला हो घर ||

Verse 195-वेदना -Anguish

कहे वेदना कलाकार से सुन मेरे मित्र ,
निपट अकेली रेखाओं से बना रहा चित्र।
तेरे चित्रों में जीवन की रंगत तब झलकेगी ,
जब मेरे हित खाली रखोगे तुम मन का घर ||

Verse 187-चिंता-Tensions

चिंता की रेखा छाए मानव के माथे पर,
हर पल उसके मन में रहता भयभीति का डर |
मौत से पहले उसे निगलता पशु बनैला बन,
रसता -बसता हँसता-गाता जंगल बनता घर||

Verse 176-मुखौटा-Mask

बाहर हँसती भीतर-भीतर चुभते हैं खंजर,
पुच-पुच करती चुम्मा देकर ख़ुश करती है पर।
जीवन के संघर्ष और तिस पर घुन-खाया उद्यम,
बात समझ न आए तो फिर ढहता जीवन-घर ||

Verse 171-दुःख-Grief

वास्तु प्राप्त नहीं होती वह दिल मरता जिस पर,
मगर उदासी के होते हैं बहुत ही मीठे सुर।
दुखों की बेला में नादां दिल खुशियों को तरसे,
ख़ुशी मिले तो ग़मों को खोजे भूले-बिसरे घर ||

Verse 168-ज़िन्दगी- Life

मैं नौसिखिया, और कठिन है जीवन का सफर,
मेरे बस में रूह क्या होगी, बस में नहीं है धड़ |
मुझे ज़िंदगानी से ना नफरत ना प्यार,
इसीलिए शायद है मेरा बिलकुल खाली घर ||

Verse 102-बादल-Clouds

मेरी जान ! बरसना है तो बरसो बन बौछार,
झिजक, क्लेश मिटा दे सारे तू निर्भय होकर |
घोल दे हर शंका, बह जाने दे हर संशय को,
चलो डुबो दें कसक भरे, गहरे गहवर में घर ||

Verse 104-धाकड़ – Fearless

ना मैं मियाँ, राजपूत ना, ना पंडित ना ठक्कर,
मेरी कोई जात नहीं, ना भोट ना मैं गुर्जर |
नाम है धाकड़,काम है धाकड़, मेरी राह भी धाकड़,
इस दो-मुंही दुनिया अंदर कोई न मेरा घर ||

Verse 105- तैरना-Swim

हिम्मत टूटे तो ले डूबे जीवन जल-गहवर,
हाथ और पैर चलाता जा तू सिर तू ऊपर कर |
इस गहवर से बचना है तो बन जाओ तैराक ,
तभी घाट पे पहुँचोगे पाओगे अपना घर ||

Verse 156-जीव-Creature

एक वीर्य की बूँद में लाखों करे सर-सर ,
उनमें शामिल कितने सीज़र, ईसा और अकबर |
लेकिन माँ की कोख के भीतर मुझे स्थान मिला,
इसी लिए मैं कहता मानव-जीवन तुक्का-घर ||

Verse 152-जीवन काल -Life cycle

सोचें जो-क्या होगा जग का यदि गए वे मर ,
उनके बिना चलेगा कैसे सृष्टि का चक्कर |
उनकी देह को कीड़े खाते, समय बड़ा बलवान,
सृष्टि चलती रहती बनती कब्रें उनका घर ||

Verse 151-जीवन यात्रा-Life journey

हम मुसाफिर, जीवन टैक्सी, चालक परमेश्वर,
रिश्ता आपस में तीनों का सादा और मुख’सर |
कोई पुकारे,  रोके टैक्सी फ़ौरन लेता सुन,
जेब में अगर किराया हो तो झट पहुँचता घर ||

Verse 7 – मेरी जिद- My Insistence

जीवन तरसायेगा, कुचलेगा कब तक आखिर,
मई वियोगी ज़िद है मेरी अड़ियल ज्यों खच्चर |
चाबुक खून चुभन सहूँ पर न छोडूं यह ज़िद ,
घर बनाने आया हूँ तो,निश्चित बनेगा घर ||

Verse 109-स्वामी-Master

‘राजपूत-स्कूल’ में पढ़ते ,जम्मू के अंदर
बेली राम हुआ करते थे हिस्ट्री के मास्टर |
ऐसा सबक पढ़ाया उन्होंने इस जीवन का सुन्दर
भूला नहीं, तभी बन पाया दिव्य मेरा यह घर ||

Verse 98-इंतज़ार-Wait

इंतज़ार के पल लगते हैं भारी वर्षों पर
प्रति-पल भरता अनगिन चिंता ह्रदय के भीतर |
मधुर-मिलन के साल बीतते आँख झपकते ही ,
इंतज़ार में तिल-तिल करके जलता अपना घर ||

Verse 94-पीड़ा-pain

हश्र क्या होगा तन का तेरे, तुझ पे है निर्भर,
एक समय आता हो जाता जब बद से बदतर |
पीड़ा की दौलत से तब भर लेना तुम तिजोरी,
पीड़ा की बुनियाद पे बनता रसता-बसता घर ||

Verse 84-छाँव – Shade

असमंजस है ऐसा कुछ न सूझे इधर-उधर,
पूछ रहा पत्ते-पत्ते से बस्ती बसी किधर |
है किस ओर ठिकाना मेरा, मुझे चाहिए छाँव,
तपती जलती धूप में जल कर ढूंढूं अपना घर ||

Verse 72-पतंग – Kite

जीवन एक पतंग की नांईं, छूती है अम्बर,
परवाह नहीं जो मांझा देता चीरें हातों पर।
कस के रख तू बिना ढील के, मांझा बहुत है तेज़,
यदि लड़ाने पेंच चढ़ा कर लाने वापिस घर ||

Verse 76-मौत – Quietus

मानुष सोचे अमर स्कीमें कुशल हैं कारीगर,
चीलों जैसी मौत घूमती गगन में, भूले पर |
ताक लगी रहती है जिसको-दीखे जो कमज़ोरी,
मार झपट्टा ले जाती है खाली करती घर ||

Verse 65-मोहिनी – Illusion

छलिया क्षितिज उम्मीद जगा कर डाले सौ चक्कर ,
छल मरीचिका और बनाती पीड़ा को दुःख कर |
जलते-तपते मरुस्थलों मेँ इंसा चलता जाता ,
उफ़क की दूरी काम न होती आस न आती घर ||

Verse 60-Discover – खोज

काम-रुपयों की सांगत मेँ , हुआ है डर-बेदर,
मेरे लिए खुला डर किसका, कौन-सा मेरा गढ़ |
किस के केश ढकेंगे मेरा नंग-मनंगा तन ,
किसके होंठ रंगेंगे मेरा यह मैला-सा घर ||

Verse 59-दिलेर – Brave

क्यों बुनते हो , सोचो लोगो, संकोची बुन्तर ,
कौन सा डर है तुम्हे सताता हुई है क्या गड़बड़ |
मौत का इक दिन निश्चित है फिर क्यों मरते रोज़ ,
खौंफ निकालो मन से तो ही , निर्भय होगा घर ||

Verse 54- पराया -Alienation

शिकार यार बनाया झेले ज़हरीले खंजर ,
दिल का मॉस खिलाया उसके टुकड़े टुकड़े कर|
पर उसने ये चुग्गा चुग कर ऐसी भरी उड़ान,
खेत पराये जाकर बैठा, बैठा दूजे घर ||

Verse 124 – ज़िन्दगी का चक्र – Life-Cycle

जीने का क्यों मोह है इतना, करता व्यर्थ फ़िक्र,
मिलोगे दाता जब तुम हमसे करेंगे लाख शुक्कर।
शुक्र मनाऊं अमर नहीं है यहाँ जीव निर्जीव,
थकी-हांफती नदिया जा मिलती है सागर घर ||

Verse 120 – सरल जीवन – Simple Life

चल रे मन आ सुनें कहीं जा चिड़ियों की फुर-फुर,
जन्म -मरण के झंझट भूलें कड़वे और बे-सुर |
मस्त हुलारे लेकर मनवा झूले झूला आज ,
इन्ही सुहानी खुशियों में संग रंग ले अपना घर ||

Verse 40 – खोजी – Inquistive

प्यासा मन तो बन जाता है फौलादी औज़ार ,
खोजी खोजें खोज खोज कर जान खुरदुरी कर |
इसी तरह फिर सच्चे खोजी ढूंढे जीवन-सार ,
प्यास बुझाते और बनवाते वह फौलादी घर ||

Verse 44 – स्वर्ग – Heaven

मानव के कर्मो का लेख होता है आखिर,
स्वर्ग के मुंशी तब कहते है प्राणी देर न कर|
जितनी देर करो वो उतनी ‘सुरगी घटाते ,
सो बेहतर है रोज़ बैठकर लेखा करले घर ||