Verse 161- आज़ादी -Freedom

मोक्ष और मुक्ति बात है कल्पित मेरे साथ न कर ,
मेरे सीधे सरल ह्रदय को नहीं बना दुष्कर |
मैंने तो बस इतना जाना इतनी मेरी सोच,
आशिक सच्चा इश्क़ करे तो मुक्ति मिलती घर ||

Verse 126-सौंदर्य- Beauty

आँख हिरनिया भवें कमानी काजल है नश्तर,
तेज़ कटीले तीर नज़र के छोड़ मेरी खातिर |
होंठ तुम्हारे नारंगी से दांत मखाने से ,
तू आई तो स्वर्ग बना है भाग-भरा है यह घर ||

Verse 119-प्रेमी -Lover

मुझे खेद है क्यों उपलब्ध न मदिरा का सागर,
क्यों नहीं गुल्ली-डंडा? क्यों न चिड़िया की चूर-मुर |
इन कष्टों में डूबे मुझको याद सताए तेरी ,
फिर सोचूँ सब ठीक है जब तक तुम हो मेरे घर ||