Verse 179-प्रिय -Beloved

रूप तेरा यह रहने न दे सुधबुध रत्ती भर,
तुझे बैठा कर मेरी सजनी सर और आँखों पर।
ऐसा मेल-मिलाया मैंने शिव-गौरी भी उचके ,
जिस शब तूने रात गुज़री पहली मेरे घर ||

Verse 166-विप्रलंभ-Separation

सुन विलाप हीर का हरगिज़ ठट्ठा-हँसी न कर,
बारिसशाह का किस्सा सुनकर सिसकी आहें भर |
इक -दूजे को तरसें रहें, दुनिया करे अलग,
शोक भरे दुखांत यह किस्से,शोकाकुल है घर ||

Verse 114-महबूब- Lover

तू मस्तानी, है मन-भानी रूप का तू सागर,
ओक लगा के मांग रहा हूँ उंढेल दे तू गागर |
मुझे रूप की तृषा, प्रेम-जल का हूँ मैं तो प्यासा,
छलक रहा है रूप-तरंगित तेरा प्रेमिल घर ||

Verse 129-प्रणय-Love

जब मम्मी मंदिर जाती है और डैडी दफ्तर,
मैं खिड़की से करूँ इशारा वो आता अंदर |
पूछ मुझे मत क्या करते हम होता क्या है हाल,
प्रेम-प्यार में तब बनता है घर के अंदर घर ||

Verse 128 – बाहरी सुंदरता – Physical love

वह कहती महके है तन मेरा होंठ मेरे शक्कर,
उस पर मुझे यकीन तभी करूँ उसका मई ज़िक्र।
पूछ न मुझसे कैसे उसको इसका मिला सुराग,
क्या बतलाऊँ इक दिन चोरी मिला मुझे था घर ||