Verse 207-सूत -Thread

देह सूत है मन चरखा है या मन है सूत्र ,
यही पहेली हल करने में बीती जाए उम्र|
देह-कताई चलती रहती क्या चरखा क्या सूत,
गिन न पाया इस बुनती के सारी उम्र मैं ‘घर’ ||

Verse 162- Bistar- Bed

नर्म मुलायम मख़मल जैसे मिले मुझे बिस्तर,
क्यों विकल मन चैन ना पाए, नींद न आए पर |
भला रूह की आँख से ओझल रहते कौन-से रंज,
कैसे भाग्य प्रतीक्षा करते बैठे मेरे घर ||

Verse 82- विचार- thoughts

जितने मन हैं उतनी सोचें उतने ही अंतर,
अपने-अपने नाप से सब के बनते हैं वस्र |
भेद सोच का है यह सारा, अपनी-अपनी खोज,
जिसको जैसा भाया, वैसा लिया बनाए घर ||

Verse 55- मन – Mind

यह मन पाखी उड़ता जाए , भले थके हो पर,
उड़ते-उड़ते तन का चाहे बन जाये पिंजर |
न ही उसका ठौर ठिकाना , न इसकी मंज़िल,
लम्बी दिव्य उड़ाने पे निकला , पर न कोई घर ||