Verse 13 -उदासीन – Indifferent

मैं पागल था दुनिया ने भी समझा , की न खातिर ,
मैंने भी सम्मान दिया न, किया न उसका आदर |
देता क्या आदर उसको जो समझे मुझे अकिंचन,
उसकी खातिर क्यों उजाड़ू मेँ अपना ही घर ||

Verse 82- विचार- thoughts

जितने मन हैं उतनी सोचें उतने ही अंतर,
अपने-अपने नाप से सब के बनते हैं वस्र |
भेद सोच का है यह सारा, अपनी-अपनी खोज,
जिसको जैसा भाया, वैसा लिया बनाए घर ||

Verse 13 – उदासीन – Indifferent

मै पागल था दुनिया ने भी समझा , की न खातिर,
मैंने भी सम्मान दिया न , किया न उसका आदर |
देता क्या आदर उसको जो समझे मुझे अकिंचन,
उसकी खातिर क्यों उजाडूँ मै अपना ही घर ||