Verse 191-नास्तिक-Atheist

मंदिर-मस्जिद मैं न जाऊँ, इन्सां मैं अक्खड़ ,
हिन्दू समझे नास्तिक हूँ मैं मुस्लमान काफ़िर।
नाम वियोगी इश्क़ हुआ है मुझको कविता संग ,
इसी लिए कविता देवी को पूजन अपने घर ||

Verse 174-कविता -Poem

कहे यदि वह मुझे कि- तेरी कविता है सुन्दर,
पूजूंगा उसको रख अपना माथा पैरों पर।
नहीं थकूंगा लेते उसके गोरे गालों का चुम्बन,
कर-कमलों से पकड़ के उसको ले आऊँगा घर ||

Verse 107-ज्ञान-Knowledge

एमर्सन को वेद ज्ञान क्या? कहते प्रोफेसर
उसकी लिखी कविता ‘ब्रह्मा’ एक बार तो पढ़ |
वे कहते ईसाई विधर्मी गीता पाठ क्यों करता ,
मैं कहता वह सार ज्ञान का, और इक सांझा घर ||

Verse 148- कविता -Poem

धागा टूट रहा है, सीवान आती न सुन्दर,
टेढ़ी-मेढ़ी कलम है मेरी  खींच रही है लकीर |
सीधा कर दे धागा, मेरी है अरदास कलम,
रह ना जाए कहीं अधूरी मेरी कविता घर ||

verse 86-कविता- Poem

कविता को अब कहाँ मिलेंगे ऐसे बहते सरोवर,
कालिदास और षैली ग़ालिब कविता स्रोत अमर।
एक वियोगी नामक नादां, नए सुरों में खोया,
बहने की तरकीबें सोचे बैठे-ठाले घर।।

Verse 1 – भेंट – Gift

ले यह भेंट और दे चरणामृत दाता मेरे ठाकुर,
मैं चढ़ावा लेकर आया अपनी कविता ‘घर’ |
ना मैं लाया भेंट रूपया ना ही मांगू दौलत,
मेरी भेंट यह लेकर बाँट आना घर-घर ||