Verse 175-डोगरी -Dogri

डोगरी की बदहाली पर है मुझ को बहुत फिकर,
न कोई पढ़ता-सुनता न ही करता कोई ज़िकर।
शायर इसके इक-दूजे से झिझके-ठिठके रहते,
बिना दौड़ के बेदम होकर बैठे रहते घर ||