Verse 182-केहरि सिंह “मधुकर”-Kehri Singh “Madhukar”

बदल भैया बरसोगे जब डुग्गर देश में जाकर,
मिलना उससे जिसका नाम है केहरि सिंह ‘मधुकर’ |
मेरी वाह-वाह देकर उसको ‘डोली’ कविता पर,
उसका उत्तर बिना सुने ही लौट आना तुम घर ||

Verse 43 – पंक्ति – Line

दर-दर भटकूँ पूर्व, पश्छिम,दक्षिण, और उत्तर,
मुझसे कहीं छुपा रखे थे दाता ने अक्षर |
गली-गली मैंन भटका, कोमल पंक्ति मिली ना एक,
मिली अंततः मुझे अचानक खड़ी वो मेरे घर ||