Verse 193-सिनेमाघर -Theatre

इन्सां बड़ा खिलाड़ी बनता खेल-खेल मगर ,
वाह-वाही की खातिर हर पल बनता है एक्टर।
थपकी अच्छी होती केवल वही जो हो स्वाभाविक ,
वारना उसका घर बन जाता बिलकुल सिनेमाघर ||

Verse 182-केहरि सिंह “मधुकर”-Kehri Singh “Madhukar”

बदल भैया बरसोगे जब डुग्गर देश में जाकर,
मिलना उससे जिसका नाम है केहरि सिंह ‘मधुकर’ |
मेरी वाह-वाह देकर उसको ‘डोली’ कविता पर,
उसका उत्तर बिना सुने ही लौट आना तुम घर ||

Verse 174-कविता -Poem

कहे यदि वह मुझे कि- तेरी कविता है सुन्दर,
पूजूंगा उसको रख अपना माथा पैरों पर।
नहीं थकूंगा लेते उसके गोरे गालों का चुम्बन,
कर-कमलों से पकड़ के उसको ले आऊँगा घर ||