Verse 216-लहर -Wave

नैय्या है कमज़ोर और लहरें आई है ऊपर ,
धारा में है तेज़ नुकीली चट्टानें-पत्थर।
घाट पे नर्तन करती पीड़ा, घुंगरुं उसके छनकें ,
आशाओं का मांझी , बोलो कैसे पहुँचे घर ||

Verse 98-इंतज़ार-Wait

इंतज़ार के पल लगते हैं भारी वर्षों पर
प्रति-पल भरता अनगिन चिंता ह्रदय के भीतर |
मधुर-मिलन के साल बीतते आँख झपकते ही ,
इंतज़ार में तिल-तिल करके जलता अपना घर ||

Verse 94-पीड़ा-pain

हश्र क्या होगा तन का तेरे, तुझ पे है निर्भर,
एक समय आता हो जाता जब बद से बदतर |
पीड़ा की दौलत से तब भर लेना तुम तिजोरी,
पीड़ा की बुनियाद पे बनता रसता-बसता घर ||

Verse 84-छाँव – Shade

असमंजस है ऐसा कुछ न सूझे इधर-उधर,
पूछ रहा पत्ते-पत्ते से बस्ती बसी किधर |
है किस ओर ठिकाना मेरा, मुझे चाहिए छाँव,
तपती जलती धूप में जल कर ढूंढूं अपना घर ||