Verse 177-नफ़रत-Hate

प्रेम की किसने थाह है पाई प्रीत गहन-सागर,
नफ़रत की पैमाईश भी न आसां होती पर।
इतना भेद तो इनका समझ में सबके आता है,
नफ़रत घर को तोड़े लेकिन प्रीत बनाती घर ||