Verse 9 – डोर – Thread

कच्चा धागा प्रीत, कह गए रामधन कविवर,
यही सूत जब कसने लगता देता लाख फ़िक्र |
पया रामधन जी मुझ को दे दो ऐसी सीख,
अगर बंधी न डोर प्रीत की कैसे बनेगा घर ||