Verse 223- जाति पात- Casteism

एक रोज़ पूजा करने मैं पहुंचा राजा के मंदिर,
पंडित की बेटी से मेरी ऐसी लड़ी नज़र |
मैं ठाकुर का बेटा देखूं इस दुनिया की रीत ,
जातपात के झंझट से हैट ढूँढूं अपना घर |

Verse 178-मंदिर -Temple

घर होता है धर्म का मंदिर, मंदिर प्रेम का घर,
मंदिर धर्म का घर होता है-घर प्रेमिल मंदिर।
प्रेम और घर समधी होते हैं मंदिर प्रेम भी समधी,
प्रेम-प्यार से धर्म निभा कर मंदिर बनता घर ||

Verse 104-धाकड़ – Fearless

ना मैं मियाँ, राजपूत ना, ना पंडित ना ठक्कर,
मेरी कोई जात नहीं, ना भोट ना मैं गुर्जर |
नाम है धाकड़,काम है धाकड़, मेरी राह भी धाकड़,
इस दो-मुंही दुनिया अंदर कोई न मेरा घर ||

Verse 140-विभेदन- Discrimination

चाहे मारे पीटें मुझको  मैं यह कहूँ मगर,
हर मज़हब, हर कौम ने, ज़ारी रखी है गड़बड़ |
करें विभाजन जातपात के छोटे-छोटे वृत्त,
दीवारें और बाड़ लगा कर बाटें सांझे घर ||

Verse 81- बच्चे – Children

बच्चों के हम जनक हैं, वे ना हमारे मगर,
समतल उनकी सोच के गर तुम रहने दो क्षेत्र |
कोई बनेगा इनमें गौतम होगा कोई मसीह,
सोच हमारी भिन्न है चाहे साँझा अपना घर ||