Verse 21– मुक्त – Freedom

एक पण्डितायन बाली विधवा उसका भी था घर,
उसके तन की तपन-जलन अब दूर न होती पर |
घर वह उस अभोल का दमघोटूं एक जेल,
तभी कहूं मई तोड़ ज़ंजीराज नया बसा ले घर ||