Verse 169-क्रोध-Anger

माथे की तू पोंछ ले तू भृकुटि, चेहरे जऐ संवर,
क्रुद्ध रूप यह देख तुम्हारा, सेहमा सारा घर।
नहीं भूलना सीखे यह मेरी ‘खींचे रखना डोर’,
प्यार और अनुशासन ही मिल कर सुखी बनाते घर ||