Verse 50 – सन्नासर- Sannasar

एक दफा मैं निपट अकेला गया था सन्नासर ,
चुम्बक जैसे कोई खींच लोहे को ऊपर |
सर इसका सूखा है लेकिन सुन्दर सहज नज़ारा,
अगर कहीं तौफीक हुई तो यहाँ बनाऊंगा घर ||