Verse 90-झिण्डी – Shrimp

‘झिड़ी’ के मेले यात्री आकर करते हैं ‘जातर’,
चिंताओं में आकुल होकर सीखते हैं मंतर |
वहम दिलों के, भूत न निकले, जातर-वातर करके,
वहम के कारण भूत-बंगले बनें है उनके घर ||

Verse 89-ब्रह्मा-Brahma

जीवन दिया मुझे ब्रह्मा ने, पर जीवन देकर,
सोच रहा है इसको भाते धरती और अम्बर |
सोच रहा हूँ उससे क्या मैं वाद-विवाद में उलझूं,
ब्रह्मा मस्त है अपने घर में, मैं व्याकुल अपने घर ||