Verse 84-छाँव – Shade

असमंजस है ऐसा कुछ न सूझे इधर-उधर,
पूछ रहा पत्ते-पत्ते से बस्ती बसी किधर |
है किस ओर ठिकाना मेरा, मुझे चाहिए छाँव,
तपती जलती धूप में जल कर ढूंढूं अपना घर ||

Verse 125 – रौशनी – Light

ईश्वर ने है दिए रात को अनगिन नयन हज़ार,
जब डूबे है सूरज दुनिया सो जाती अक्सर।
लौ की प्यासी दुनिया को न मिलते प्रेम-सपन,
लालटेन पाकर अँधियारा, जगमग करे है घर।|