Verse 187-चिंता-Tensions

चिंता की रेखा छाए मानव के माथे पर,
हर पल उसके मन में रहता भयभीति का डर |
मौत से पहले उसे निगलता पशु बनैला बन,
रसता -बसता हँसता-गाता जंगल बनता घर||

Verse 92-मुक्त – Free

भृकुटी माथे डाल के यारा, चित दुखी न कर,
द्वेषी, और रंजिश भारी पड़ते सदा ही प्रीती पर |
कड़वे बोल न बोल तू चाहे तोड़ दिलों के रिश्ते,
छोड़ यह रंजिश आओ चलें हम अपने-अपने घर ||