Verse 207-सूत -Thread

देह सूत है मन चरखा है या मन है सूत्र ,
यही पहेली हल करने में बीती जाए उम्र|
देह-कताई चलती रहती क्या चरखा क्या सूत,
गिन न पाया इस बुनती के सारी उम्र मैं ‘घर’ ||

Verse 148- कविता -Poem

धागा टूट रहा है, सीवान आती न सुन्दर,
टेढ़ी-मेढ़ी कलम है मेरी  खींच रही है लकीर |
सीधा कर दे धागा, मेरी है अरदास कलम,
रह ना जाए कहीं अधूरी मेरी कविता घर ||