Verse 213-कलयुग -Kalyug

समय विकट वह आने वाला लोगों के ऊपर ,
नाम के बदले जब व्यक्ति का होगा बस नंबर |
मैं सुविधा के खातिर लूँगा तब वह नंबर केवल ,
लिखा जो बिजली वालों ने है आकर मेरे घर ||

Verse 170-इंसान -Humans

मानव अक्खड़ होते हुए भी होता बहुत चतुर,
पड़े ज़रूरत तो कर लेता हृदय को पत्थर।
इसकी जिजीविषा की महिमा है वेदों में वर्णित,
वक्त पड़े तो त्याग दे बिन-झिजके यह अपना घर ||

Verse 152-जीवन काल -Life cycle

सोचें जो-क्या होगा जग का यदि गए वे मर ,
उनके बिना चलेगा कैसे सृष्टि का चक्कर |
उनकी देह को कीड़े खाते, समय बड़ा बलवान,
सृष्टि चलती रहती बनती कब्रें उनका घर ||

Verse 38 – पहर – Time

समय बहुत ही ज़ोरावर है , किन्तु मौके पर,
रेखा कोई अनजानी सी , खींचो सीने पर |
यही समय तो रास रचाता, देता है सुर ताल ,
प्रेम प्रीत से गीत बने फिर , लाड-प्यार से घर ||

Verse 100-२४ घंटे-24 hours

सबको एक सामान धरा पर देता परमेसर,
राजा रंक जिनवर पंछी, निर्बल ज़ोरावर |
चरसी और नशेड़ी को भी देता दिन प्रतिदिन,
चौबीस घंटे भेदभाव न उसके लंगर-घर ||