Verse 224- स्री- Woman

पुरुष सांड है प्यार है उसका जिस्मों की थर-थर ,
औरत गाय है उसकी प्रीत में होता बहुत सबर |
बीज गरब में धारण करती, रक्त से करती सिंचन ,
पुरुष बीज दाल कर केवल उसे बिठाता घर |

Verse 185-औरत-Women

औरत ज़ात तो कैद पड़ी है हर घर के अंदर,
यह हालत अब नहीं रहेगी बहुत देर तक पर।
जिस घर में वह कैदी बनती होती वह प्रलय,
जिस घर रहती देवी बन कर बस बसता वह घर ||

Verse 106-बेटियाँ -Daughters

वे योद्धा थे, ज़ालिम थे वे सब है मुझे खबर ,
ज़ुल्म किये मेरे पुरखों ने कैसे बेटियों पर |
वंशावली दिखाते अपनी होती मुझे ग्लानि ,
धिक वीरता, दफनाते नवजात बेटियां घर ||

Verse 21– मुक्त – Freedom

एक पण्डितायन बाली विधवा उसका भी था घर,
उसके तन की तपन-जलन अब दूर न होती पर |
घर वह उस अभोल का दमघोटूं एक जेल,
तभी कहूं मई तोड़ ज़ंजीराज नया बसा ले घर ||