Verse 203-ताला-Lock

व्यक्त मई जो भी करना चाहूँ संधे नहीं अक्षर,
सोच तो दिव्या है मेरी किन्तु अक्षर है अक्खड़ |
माँ बोली की सीमाओं ने कंठ किया अवरुद्ध ,
भीतर कैसे जॉन यह है तालाबंद इक घर |