Verse 92-मुक्त – Free

भृकुटी माथे डाल के यारा, चित दुखी न कर,
द्वेषी, और रंजिश भारी पड़ते सदा ही प्रीती पर |
कड़वे बोल न बोल तू चाहे तोड़ दिलों के रिश्ते,
छोड़ यह रंजिश आओ चलें हम अपने-अपने घर ||