Verse 231-मानव- Human

मानव क्या है ? बस मानव है – बोल गए पितर ,
समझ सका न कथन यह उनका मैं तो रत्ती-भर।
सोचूं, बहुत चतुर थे उनकी बुनती समझ ना आई ,
उस बुनती के और अधिक उलझा बैठा वह ‘घर’ ||

Verse 184-प्राचीन परंपरा-Old Tradition

पुरखों के हाथों से निर्मित तोड़े यह मंदिर,
अब लोगों में सोच भोथरी समां गई भीतर |
निज सभ्यता की निंदा का फैल चूका फैशन,
रहते मौन जो पूछ ले कोई कौन-सा उनका घर ||