Verse 157-समस्त-Everything

घाव पे रखे कोमल फाहे ज़ख्म भी देता घर,
मर्मान्तक अपशय भी देता, यश भी देता घर |
घर का रंग उतर न पाए दूर रहो या पास ,
दूर भी देता सुर-लय मन को, पास  भी देता घर ||

Verse 149- संतोष- Contentment

जो भी देता दाता उसका करता अदा शूकर ,
काम होता या ज़्यादा होता मुझको नहीं ख़बर |
स्वर्गानन्द उठाते कुटिया में भी रह खुश-दिल ,
दुखी जानो को महलों में भी लगते छोटे घर ||