Verse 20-ऊषा – Dawn

यह प्रभात की बेला लौ के अधखुले है दर ,
आद्य कुंवारी को घूँघट खुलने का रहता डर |
देखे मुझे जाने क्या बोली मारे मेरा कन्त,
इसी लिए शर्माती आती हु अपने घर