Verse 98-इंतज़ार-Wait

इंतज़ार के पल लगते हैं भारी वर्षों पर
प्रति-पल भरता अनगिन चिंता ह्रदय के भीतर |
मधुर-मिलन के साल बीतते आँख झपकते ही ,
इंतज़ार में तिल-तिल करके जलता अपना घर ||

Verse 97-क्षितिज- Horizon

मानव जैसे-जैसे चलता साथ चले अम्बर
क्षितिज की दूरी चलते-चलते मिटती नहीं मगर |
द्रिष्टी और पृथ्वी के सम पर क्षितिज बना ही रहता,
इस तरह जो चले उम्र भर कभी न पहुँचे घर ||

Verse 42 – किस्मत – Luck

मेरा भाग्य सराह रहा वो हाथ की रेखा पढ़ कर,
फीस भरो तो बतलाता हु किस्मत का चक्कर |
दिल करता है कहता दूँ पंडित अपना भाग्य सम्भालो,
फिर सोचूं कुछ चुग्गा लेकर उसे बी जाना घर ||