Verse 188- पथ-Path

तर्क और तकरार का मन में भरा रेत-सागर,
इस पर चलने से होता है मर जाना बेहतर।
अगणित पड़ जाते हैं ऐसे रूह के ऊपर ,
डगर छोड़ कर रुकना पड़ता किसी-किसी के घर ||

Verse 169-क्रोध-Anger

माथे की तू पोंछ ले तू भृकुटि, चेहरे जऐ संवर,
क्रुद्ध रूप यह देख तुम्हारा, सेहमा सारा घर।
नहीं भूलना सीखे यह मेरी ‘खींचे रखना डोर’,
प्यार और अनुशासन ही मिल कर सुखी बनाते घर ||

Verse 75- ग़रूर – Ego

मानुष इक दिन करने लगा था अल्लाह से अकड़,
कहे मैं सब से सार को जानूं, मैं ज्ञानी चातुर |
अल्लाह पूछे क्या है तेरा बोलो मुझसे रिश्ता,
तब मानुष सर नीचे कर के आया वापिस घर ||

Verse 132- दुनिया – World

मेरे प्यार को नज़र लगाती देखे देखे बितर-बितर ,
दुनिया मुझको कुचल-कुचल कर करती है गोबर |
मैं गोबर यह लेकर अक्सर लेपूं वो दीवार ,
जिस जगह पे टंगी है तेरी फोटो मेरे घर ||